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आज कुछ ऐसा लिखूं

September 08, 2020 | 1 min read

First four lines of this poetry are written by @learner_forlife. It inspired me to write a small poetry. Something about expressing and unravaling love in disguise.

आज मन किया
कि कुछ ऐसा लिखूं
जैसे रहूं तो सब के सामने
फिर भी किसीको ना दिखूं

सब्र की करूं आजमाइश
मेरे शब्द प्रणय की प्रस्तावना है
कोई जो हो जाए उपलब्ध इन्हें
इंतजार वही, एक संभावना है

अलकाब से नहीं मुश्किलें उन्हें
वो वाकेफ है मेरी फितरत से
कुछ पोशीदा राझ की यह बात है
ज़ज्बातों का उमटा सैलाब है

आज फिर वही रात
फिर वही चांद है फलक पे
आज मन किया
इस चांदनी को कलम में भर कर
कुछ अफसाना ऐसा लिखूं
इज़हार भी करूं सबके सामने
फिर भी किसीको ना दिखूं

अलकाब - संबोधन
पोशीदा - गुप्त, छिपाया हुआ
अफसाना - कहानी


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