inward locus

में मुझ से मिलना चाहता हूं

April 07, 2020 | 1 min read

अस्तित्व से जुड़ने की आकांक्षा मुझे मेरे निकट ला खड़ा करती है। जीवन की इस गतिशीलता से तिरोहित यह काव्य सर्जना की कुछ बूंद समान है। सीमा बद्ध जीवन के माध्यम से अभिव्यक्ति अनुबोधित हो रही है। शायद कहीं इसी से कोई दिशा मिल जाए।

क्या सच, क्या झूठ
क्या सही क्या ग़लत
ये प्रश्न जहां नहीं
प्रश्न हो तब भी
नहीं अब उत्तर की तलब
द्वंद्व से खाली में
अपने भीतर डूबना चाहता हूं
में मुझसे मिलना चाहता हूं

जब जिक्र हुआ था हस्ती का
शोर मचाया था इन हवाओं ने
मौज में थी सारी दुनिया
में तो खड़ा मौन
फिर भीतर कैसा ज्वार मस्ती का
उस मौन कि मस्ती मे
सांस सांस पिगलना चाहता हूं
में मुझसे मिलना चाहता हूं

समंदर में नहाऊ
लेट जाऊं रेत में
दौडू खुले आकाश के नीचे
खो जाऊं कोई खेत में
धूप को लेकर आगोश में
चाहत की बाहें फैलाना चाहता हूं
मैं मुझसे मिलना चाहता हूं

बंधन की वेदना
वेदना का बंधन
यह कैसा निरंतर प्रवाह
कोई उन्माद में ही मुग्ध
में अंधाधुंध जी रहा
ठोकरों से ही मिले तो क्या
राह जो पूर्णता की
चलते चलते कहीं
अहम जरूर मिल जाएगा मिट्टी में
फिर हो कर धूल धूल
व्योम भर में फैल जाऊ
ऐसी एक लहर में डोलना चाहता हूं
में मुझसे मिलना चाहता हूं


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