inward locus

शब्दों का यह कैसा खेल

March 29, 2020 | 2 min read

में कभी सही शब्द नहीं ढूंढ़ पाया व्यक्त कर ने के लिए। हर बार टूटे हुए शब्द और फिझुल के अर्थ का सहारा लिया और अपनी बात रख दी। शब्द कभी सहायता ना कर पाए। प्रेम का अनुभव हो या सुख का या शांति का, शब्दों का महोताज कभी नहीं रहा। लोगों का परिचय शाब्दिक न भी हुआ हो, पर उनका प्रभाव, उनके आसपास बनी उनके व्यक्तितव की आभा ने हमेशा सही प्रेरणा दी है। शब्द कुछ बोले होंगे तो भी उसका कुछ मोल नहीं रहा होगा। वह क्षणिक आवेश का परिणाम था। मनकी सरलता, चाहे वह सामने वाला व्यक्ति हो या फिर मेरा खुद का मन, शब्दों से जुड़ी उत्पात की व्यथा से दूर ले के जाती है और बेशक मौन को मधु बना देती है।

मौन रहकर ही देखा है शीशे का टूटना, तपस्या का जुड़ना, जज्बातों का मचलना। उसी मौन को सजाकर एक कविता कहूंगा।

शब्दों का यह कैसा खेल
लोग मिलकर खेले
कहा कुछ सुना कुछ
कुछ और ही समझे अलबेले

शब्दों के बाजार में लोगों के
देखें अनोखे ठेले
कोई शब्द सजाकर बेचे
कोई दे दे मैले के मैले

सोचा मैं भी खरीदूं
कुछ शब्द मैंने भी बोले
हर कोई लेके बैठा तराजू
सब ने अपने अर्थ तोले

दो कौड़ी में भी नहीं बिका
जहां मैंने बेचना चाहा
और दूर कहीं अनजान ठेले पर
किसी ने अनमोल कह सराहा

होती है कीमत शब्द की
या बोलने वाले की
में समझ नहीं पाया
ना फिर कुछ बोल पाया
अपना शब्द जाल समेटकर
में यूं ही लौट आया
सत्य को नहीं ढूंढ पाया

सत्य और शब्द
कैसे इनको भिन्न कहूं
कैसे इनको अभिन्न कहूं
कौन ये समझाएगा
अंतर को करू अनदेखा
दोनों सम्मुख
सेंध लगाकर जोड़ दूं
या तो फिर कर दू अलग अलग
बारूद बनाकर दोनों को फोड़ दू

ना रहे शब्द
ना रहे सत्य
ना रहे कोई समस्या
कुछ समझने की
ना रहे मत मतांतर
ना रहे कोई आपदाएं
आपस में उलझने की

ठेले में क्या रखा है
छोड़ो सारी झंझट
कुछ ना लूंगा कीमत
मिलकर हम सुलझाएंगे
एक बार जो अगर बदले
अपना जरिया, अपना दृष्टिकोण
समझने समझाने से परे
महसूस करना है अगर
भावनाओं को
ह्रदय के तार किसी और से
जोड़ने की संभावनाओं को
तो एक मौका है, मौन

उठेंगे कई सवाल
मैं जानता हूं
पूछेंगे तात्पर्य इस पद्य का
मैं जानता हूं
हर कोई होगा आक्रमक
मुझे मेरी उम्र बताएगा
यह सूफियानी बातों का क्या अर्थ है
कौन सी आपत्ति आन पड़ी
कहेगा ऐसे तो तुम न थे
मैं तुम्हे ठीक से पहचानता हूं

पर याद रखना तुम मेरी एक बात
हां तुम
जो इस पद्य को पढ़ रहे हो
यह कोई विशेष रचना नहीं
यह भी एक शब्दों की भ्रांति है
जिसने पढ़ा एक एक शब्द
जिसने समझा एक एक शब्द
वह बन गया प्रश्न कार
और शब्दों में उलझ गया
तुम हंसोगे
हंसकर आगे बढ़ जाना है
वह हंसी ही तो
असली क्रांति है

प्रश्न कार तो आएंगे
एक-एक कर सब आएंगे
उन्हें रोक सकता है कौन
पूछना है जो पूछे
समझे जो समझना है
जब मैं भी हंसकर हो जाऊं
मौन

(२४.१.२०२०)


The best way to contact me is to write me a letter to my e-mail address : inwardlocus@gmail.com

©2020, Inward Locus